पूर्णिया जिले के रुपौली में विगत दिनों हुई एक जनसभा ने राजनीतिक माहौल में खलबली मचा दी। खेसारी लाल यादव जब मंच से बोले कि “मंदिर तो बनाइये, लेकिन क्या सिर्फ घंटा बजाने के लिए?” — इस सवाल ने उनके द्वारा उठाए गए विकास‑और‑रोजगार के मुद्दों पर नई बहस छेड़ दी। उन्होंने कहा कि उन्हें ‘सनातन विरोधी’ कहा जाता है, पर उन्होंने प्रश्न उठाया कि मंदिर‑निर्माण में क्या इतनी ऊर्जा खर्च की गई कि युवाओं को काम‑रोजगार मिल सके? उन्होंने जोर देकर कहा कि बिना बदलाव के बिहार का भविष्य सुरक्षित नहीं रहेगा।
इमरान प्रतापगढ़ी का हमला
इस दौरान मंच पर मौजूद इमरान प्रतापगढ़ी ने भी केंद्र व राज्य सरकारों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि दिल्ली में बैठे कारोबारी‑ग्रुप्स ने रेल, तेल, एयरपोर्ट तक बेच दिए और अब दूरस्थ तरीके से बिहार की व्यवस्था पर नियंत्रण करना चाह रहे हैं। उन्होंने साथ ही जनता से अपील की कि इस चुनाव में सिर्फ प्रतीकों पर ध्यान न दें बल्कि “बीमा भारती” जैसे उम्मीदवारों को समर्थन दें ताकि विकास‑प्रक्रियाएँ तेज हों।
क्यों अहम है यह घटना
इस जनसभा को चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में आयोजित किया गया था, जिसका मतलब था कि राजनीतिक दलों के लिए अब व्यक्तिगत बयान एवं भावनात्मक अपीलें निर्णायक भूमिका निभा रही थीं। खेसारी ने मंदिर‑निर्माण को पूरी तरह खारिज़ नहीं किया, बल्कि इस बात पर सवाल खड़ा किया कि जब युवाओं के लिए काम‑रोजगार नहीं, शिक्षा‑स्वास्थ्य की सुविधा नहीं है, तो सिर्फ मंदिर‑घंटे‑प्रश्न इतना पर्याप्त क्यों हो गया? इस दृष्टिकोण ने धर्म‑संबंधित प्रतीकों और विकास‑उपयोगी एजेंडा के बीच संतुलन की आवश्यकता को पुन: उजागर किया।
आगे क्या राज है?
आगे की दिशा में देखना होगा कि इस तरह के बयानों का मतदाताओं पर क्या असर होगा — क्या धार्मिक प्रतीक‑प्रधान रणनीति के अनुप्रयोग में कमी आएगी और विकास‑केन्द्रित राजनीति को बढ़ावा मिलेगा? या फिर प्रतीक‑राजनीति अपनी पकड़ बनाए रखेगी? इस सवाल का उत्तर अगले दिनों में दिखेगा।
